Yogi Govt vs Shankaracharya: प्रयागराज की पावन धरती पर माघ मेले के दौरान जो कुछ हुआ, उसने पूरे देश के संतों और सनातनियों को झकझोर कर रख दिया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने बुधवार को भारी मन से प्रयागराज छोड़ दिया और काशी के लिए प्रस्थान कर गए।
लेकिन जाते-जाते उन्होंने योगी सरकार और प्रशासन पर जो आरोप लगाए हैं, उसने उत्तर प्रदेश की राजनीति और धर्म जगत में भूचाल ला दिया है। पिछले 10 दिनों से अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठे शंकराचार्य ने साफ कर दिया कि वह अपमान सहकर सरकारी ‘रेवड़ियां’ लेने वाले संत नहीं हैं। उन्होंने इस घटना को अपने जीवन का सबसे बड़ा दुख बताया है और अब गेंद सनातनी जनता के पाले में डाल दी है।
सरकारी प्रस्ताव को बताया
‘लालच का जाल’शंकराचार्य के जाने से पहले प्रशासन ने उन्हें मनाने की आखिरी कोशिश की और कुछ प्रस्ताव सामने रखे। लेकिन शंकराचार्य ने इन प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार और प्रशासन अपनी गलती मानने या पछतावा करने के बजाय उन्हें लोभ-लालच देकर चुप कराना चाहते हैं। प्रशासन ने प्रस्ताव दिया था कि वे शंकराचार्य को पालकी में ले जाकर संगम स्नान कराएंगे और भविष्य के लिए चारों शंकराचार्यों के लिए एक विशेष नियम (SOP) बनाएंगे। इस पर बिफरते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पूछा कि अगर पालकी में जाना गलत था तो अब क्यों ले जाना चाहते हो? और अगर नियम पहले बन सकते थे तो क्यों नहीं बनाए गए? उन्होंने साफ कहा कि प्रशासन मारपीट और बटुक शिष्यों के अपमान पर बात करने के बजाय सिर्फ सुविधाएं देकर मामला रफा-दफा करना चाहता है और मुझे फंसाना चाहती है।
योगी सरकार पर तीखा हमला
और जनता की अदालतशंकराचार्य ने इस दौरान योगी सरकार पर अब तक का सबसे कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि प्रयागराज की धरती पर उन्हें जो दुख मिला, वह उनके जीवन का सबसे बड़ा दुख है। इसके सामने पुराने सभी दुख छोटे हो गए हैं। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि सनातन धर्मियों को जो यह चोट पहुंचाई गई है, इसकी भरपाई अब कौन सा नेता या कौन सी पार्टी करेगी, यह तो समय ही बताएगा। जीत और हार के सवाल पर उन्होंने बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि असली निर्णय सनातन धर्म की जनता करेगी। जब जनता अपना फैसला सुनाएगी, तभी असली हार-जीत का पता चलेगा।
काशी की ओर प्रस्थान और अनसुलझे
सवालबुधवार को जब शंकराचार्य का काफिला काशी के लिए निकला, तो भक्तों की आंखें नम थीं। प्रशासन के रवैये से आहत शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि वे वहां रुककर अपनी मर्यादा को और कम नहीं करना चाहते थे। अब सवाल यह उठता है कि क्या यूपी सरकार इस धार्मिक गतिरोध को सुलझाने में विफल रही? क्या शंकराचार्य की यह नाराजगी आने वाले समय में किसी बड़े सियासी या धार्मिक उलटफेर का संकेत है? फिलहाल, प्रयागराज से काशी तक की यह यात्रा सिर्फ एक संत का प्रस्थान नहीं, बल्कि सत्ता और धर्म के बीच छिड़ी एक गहरी रार की कहानी बयां कर रही है।
