अरब के सम्राटों के नाम एक संदेश
अमेरिका, इज़राइल और ईरान की जंग जारी है और अपने ख़तरनाक दौर से गुज़र रही है। ईरान बहुत हिम्मत और बहादुरी के साथ इन ज़ालिमों का मुकाबला कर रहा है, मगर इसके बरअक्स जब हम अरब के सम्राटों पर नज़र डालते हैं तो हमें बड़े अफ़सोस के साथ यह कहना पड़ता है कि ये लोग अभी भी ग़फ़लत की नींद सो रहे हैं। अरब, जिन्हें मुस्लिम दुनिया की क़ियादत करनी चाहिए, वे ऐश-परस्ती में डूबकर मदहोश हैं। सवाल यह है कि शिया कौन हैं? इसकी एक लंबी तारीख़ है। मुख़्तसर तौर पर मैं अर्ज़ करता हूँ कि जब ग़ज़वा-ए-खैबर की जंग हुई और मुसलमानों ने यहूदियों को इस जंग में शिकस्त दी, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यहूदियों को खैबर छोड़ने का हुक्म दिया, और यह बात उन्हें बहुत नागवार गुज़री। वे हमेशा मुसलमानों के बीच फूट डालने में लगे रहते थे। जब अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस दुनिया से रुख़्सत हो गए और ख़िलाफ़त का दौर आया, तो यही यहूदी प्रोपेगेंडा और साज़िश करने लगे और उन्होंने एक जमात बनाई जिसका नाम शियान-ए-अली रखा, और यह कहा कि ख़िलाफ़त का हक़ सिर्फ़ हज़रत अली और अहल-ए-बैत को है, जबकि उन्हीं लोगों ने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु का क़त्ल भी किया। उन्होंने हज़रत हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु को कूफ़ा बुलाकर शहीद किया, और इसी तरह यह शिया जमात इस दुनिया में वजूद में आई। ये हमेशा सुन्नी मुसलमानों के ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा करते थे और यहूदियों के यहाँ ट्रेनिंग लिया करते थे। यही शिया हैं जिन्होंने शाम (सीरिया) में बशर अल-असद के साथ मिलकर लाखों सुन्नी मुसलमानों का क़त्ल-ए-आम किया। यही शिया हैं जिन्होंने यमन की हुकूमत को गिराकर हूतियों का साथ दिया। हम इस बहस में नहीं पड़ना चाहते। बहरहाल, हम बात करते हैं अरब के सम्राटों पर—इनकी सबसे बड़ी कमी यह थी कि इन्होंने अमेरिका को अपने फ़ौजी अड्डे दिए, अपनी ज़मीन दी इस उम्मीद पर कि अमेरिका हमारी मदद करेगा, मगर आज हालात हम सबके सामने हैं। ईरान पूरे मिडिल ईस्ट पर बम और मिसाइलें गिरा रहा है और अमेरिका ख़ुद इधर-उधर भाग रहा है। बस मेरी एक दरख़्वास्त है अरब के सम्राटों से कि वे चंद नुक़ात पर अमल करें, इंशाअल्लाह कामयाबी ज़रूर हमारे क़दम चूमेगी:
1. सबसे पहले अमेरिकियों को अपने मुल्क से बाहर निकाल फेंकें।
2. अपनी एक बेहतरीन फ़ौज खड़ी करें जो दुश्मनों का सीना चीरकर अपने मुल्क की हिफ़ाज़त करे।
3. अपना सारा ज़ोर टेक्नोलॉजी पर लगाएँ और ऐसे नौजवान पैदा करें जो साइंटिस्ट हों, बेहतरीन इंजीनियर हों।
4. ऐसे स्कूल क़ायम करें जहाँ से तालीम हासिल करके हम दुनिया का टेक्नोलॉजी में मुक़ाबला कर सकें, अपना ख़ुद का हथियार बनाएँ और ख़ुदमुख़्तार बनने की कोशिश करें।
5. इलाके के जितने भी मुल्क हैं, सब आपस में मुत्तहिद हों और मिलकर अपना एक लीडर चुन लें।
6. जब भी किसी एक मुल्क पर कोई मुसीबत आए, तो सब मिलकर उसका साथ दें।
नोट: अमेरिका और इज़राइल कभी मुसलमानों के हमदर्द नहीं थे। ये कभी अरब मुसलमानों या अरब के सम्राटों के दोस्त नहीं थे। इन्होंने सिर्फ़ अपने फ़ायदे के लिए अरबों का इस्तेमाल किया और जब वक़्त आया तो मैदान छोड़कर भाग गए। यही वह अमेरिका है जिसने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला करके लंबे अरसे तक उन्हें परेशान किया। यही अमेरिका है जिसने इराक़ को बर्बाद कर दिया। यही वह अमेरिका है जिसने लीबिया को अपने फ़ायदे के लिए तबाह कर दिया। इसी तरह जब आपसे उसे कोई फ़ायदा नहीं रहेगा, तो वह आपके ख़िलाफ़ भी खड़ा हो जाएगा और आपको भी इस दुनिया से मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि हम ख़ुदमुख़्तार बनें, ऐश-ओ-इशरत छोड़कर एक अच्छा हुक्मरान बनने की कोशिश करें। हम उस वक़्त नहीं डरे जब 313 थे और बे-सरो-सामानी के आलम में थे। आज तो अल्हम्दुलिल्लाह पूरी दुनिया में मुसलमानों की तादाद बहुत ज़्यादा है। बस ज़रूरत एक बेहतरीन क़ियादत और बेहतरीन हुकूमत की है।
और मुझे उम्मीद है कि इंशाअल्लाह अगर हम इन नुक़ात पर अमल करते हुए हुकूमत करेंगे, तो हमारी बरतरी और हमारी सरबराही को दुनिया तस्लीम करेगी और हम कामयाब और सरख़रू भी होंगे। फ़क़्त वस्सलाम
क़ौम का हमदर्द,
आपका अपना भाई
एम. एस. अख़्तर बस्तवी
